सुखी जीवन का मूलमंत्र
08/06/2013 10:43
जापान के सम्राट यामातो का एक राज्यमंत्री था ओ-चो-सान। उसका परिवार सौहाद्र्रता के लिए बड़ा प्रसिद्ध था। यद्यपि उसके परिवार में लगभग एक हजार सदस्य थे पर उनके बीच एकता का अटूट संबंध स्थापित था। सभी सदस्य साथ-साथ रहते और साथ-साथ ही खाना खाते थे। फिर उनमें द्वेष-कलह की बात ही क्या?
ओ-चो-सान के परिवार की सौहाद्र्रता की बात यामातो के कानों तक पहुंची। सत्यता की जांच करने के लिए एक दिन वह स्वयं उस वृद्ध मंत्री के घर तक आ पहुंचे। स्वागत-सत्कार और शिष्टाचार की साधारण रस्में समाप्त हो जाने पर उन्होंने पूछा, ‘‘महाशय! मैंने आपके परिवार की एकता और मिलनसारिता की कई कहानियां सुनी हैं।
क्या आप बतलाएंगे कि एक हजार से भी अधिक व्यक्तियों वाले आपके परिवार में यह सौहाद्र्रता और स्नेह-संबंध किस तरह बना हुआ है?’’ ओ-चो-सान वृद्धावस्था के कारण अधिक देर तक बातें नहीं कर सकता था। अत: उसने अपने पौत्र को संकेत से कलम-दवात और कागज लाने के लिए कहा। उन चीजों के आ जाने पर उसने अपने कांपते हाथों से लगभग एक सौ शब्द लिखकर वह कागज सम्राट यामातो की ओर बढ़ा दिया। सम्राट ने उत्सुकतावश कागज पर नजर डाली तो वह चकित रह गए। कागज पर एक ही शब्द को सौ बार लिखा गया था-सहनशीलता, सहनशीलता, सहनशीलता...।
सम्राट को चकित और अवाक देख कर ओ-चो-सान ने अपनी कांपती हुई आवाज में कहा, ‘‘महाराज! मेरे परिवार की सौहाद्र्रता का रहस्य बस इसी शब्द में निहित है। ‘सहनशीलता’ का यह महामंत्र ही हमारे बीच एकता का धागा अब तक पिरोए हुए है। इस महामंत्र को जितनी बार दोहराया जाए, कम ही है।’’
